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घने जगलों के बीच पहली बार वोटिंग, बेखौफ होकर बूथ तक पहुंच रहे मतदाता

क़लम टाइम्स न्यूज़ नेटवर्क
पटना | 11 नवम्बर 2025

नक्सल के निशानों के बीच खड़े ये बूथ सिर्फ एक चुनावी व्यवस्था नहीं, बल्कि भरोसे की वापसी हैं

बिहार चुनाव के दूसरे चरण में इस बार लोकतंत्र उन पथरीली पहाड़ियों तक पहुंचा है, जहां दशकों से सिर्फ डर और दूरी का राज था. जमुई, गया जी और रोहतास के दुर्गम नक्सल प्रभावित इलाकों में पहली बार मतदान केंद्र बनाए गए हैं, और स्थानीय लोग वर्षों बाद अपने ही गांव में निर्भीक होकर वोट डाल रहे हैं.
दूसरे चरण में इस बार कहानी कुछ अलग है. जिस जमीन पर अब तक बंदूक की गड़गड़ाहट और डर की परछाईं पसरी रहती थी, वहां पहली बार लोकतंत्र अपनी पहली सांस ले रहा है. जमुई, गयाजी और रोहतास के उन जंगली और दुर्गम पहाड़ी इलाकों में अब मतदान केंद्र बनाए गए हैं, जहां दशकों से सिर्फ उम्मीद जाती थी, लोग नहीं.

बिहार पुलिस मुख्यालय के मुताबिक जमुई विधानसभा के बरहट थाना क्षेत्र स्थित चोरमारा गांव में इस बार वोट का रंग नया होगा. 1011 एससी-एसटी मतदाता, जो अब तक मीलों पैदल चलकर दूसरे गांवों में वोट देने जाते थे, पहली बार अपने ही घर के पास बने बूथ में बटन दबा रहे हैं. यह वही चोरमारा है, जो जमुई, मुंगेर और लखीसराय के नक्सली बेल्ट का सबसे सक्रिय केंद्र रहा है. 2007 में यहीं सीपीआई माओवादी की नौवीं कांग्रेस (आम सभा ) हुई थी. जिसमें गणपति, प्रशांत बोस और किशन दा जैसे बड़े नक्सली नेता शामिल हुए थे. अब उसी जमीन पर लोकतंत्र का झंडा गड़ रहा है.
इन 1011 मतदाताओं में 488 पुरुष और 523 महिलाएं हैं. महिलाओं की संख्या ज्यादा होना खुद इस इलाके के बदलते माहौल की निशानी है. बिहार पुलिस के मुताबिक, सिर्फ चोरमारा ही नहीं, गया जी जिले के इमामगंज विधानसभा क्षेत्र के पिछुलिया गांव और रोहतास के रेहल गांव में भी पहली बार मतदान प्रक्रिया शुरू की जा रही है. यहां के लोग अब डर नहीं, अधिकार की तरफ कदम बढ़ा रहे हैं.

इमामगंज के छकरबंधा थाना क्षेत्र के तारचुआ और पिछुलिया गांवों में आजादी के बाद कभी मतदान नहीं हुआ था. 2024 लोकसभा चुनाव में पहली बार तारचुआ में वोटिंग हुई थी और अब 2025 विधानसभा चुनाव में पिछुलिया गांव में बूथ बना है. दशकों की चुप्पी टूट रही है, भूगोल बदल नहीं रहा, लेकिन इतिहास जरूर बदल रहा है.
नक्सल के निशानों के बीच खड़े ये बूथ सिर्फ एक चुनावी व्यवस्था नहीं, बल्कि उस भरोसे की वापसी हैं जिसे इन इलाकों ने लंबा समय पहले खो दिया था. इस बार मतदाता अपने मूल स्थल पर जा रहे हैं, सिर उठाकर जा रहे हैं, और वोट का बटन उनके लिए सिर्फ चुनाव नहीं, आजादी का दूसरा नाम बनेगा

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