2025 भारतीय राजनीति का वह साल रहा जिसने लोकतंत्र, चुनावी पारदर्शिता, संस्थागत दबाव और सुरक्षा नीति पर गंभीर सवाल खड़े किए। यह विश्लेषण 2025 की सियासी हक़ीक़त को गहराई से सामने लाता है।
डॉ. मोहम्मद फ़ारूक़, क़लम टाइम्स न्यूज़ नेटवर्क
Kolkata : 31 दिसंबर 2025
2025 : सत्ता, संस्थाएं और सियासत — एक बेचैन साल की पूरी कहानी
2025 भारतीय राजनीति के लिए सिर्फ़ एक कैलेंडर वर्ष नहीं रहा, बल्कि यह लोकतंत्र की सेहत पर उठे कई गंभीर सवालों का प्रतीक बन गया। यह साल चुनावी जीत-हार से कहीं आगे जाकर संस्थाओं की साख, सत्ता के दबाव और जनता के भरोसे की परीक्षा बन गया। जब देश 2026 की दहलीज़ पर खड़ा है, तो बीते 2025 की उथल-पुथल को नज़रअंदाज़ करना मुमकिन नहीं। नए साल की शुभकामनाओं के साथ यह उम्मीद करना भी ज़रूरी है कि आने वाला वक्त सिर्फ़ तारीख़ें न बदले, बल्कि व्यवस्था की दिशा भी बदले।

अगर 2025 के घटनाक्रम को परत-दर-परत देखा जाए, तो दिल्ली से पटना और सरहदों से वैश्विक कूटनीति तक, हर मोर्चे पर बेचैनी साफ़ दिखती है। बिहार विधानसभा चुनावों में सत्ता की वापसी भले ही एक राजनीतिक चमत्कार कही गई, लेकिन मतदाता सूची संशोधन की प्रक्रिया पर उठे सवालों ने लोकतांत्रिक पारदर्शिता को कटघरे में खड़ा कर दिया। चुनावी मशीनरी पर पड़े असहनीय दबाव के चलते कई निचले स्तर के कर्मचारियों की मौत ने यह सोचने पर मजबूर किया कि क्या चुनाव जीतने की क़ीमत इंसानी जानों से चुकाई जा रही है।
विपक्ष द्वारा लगाए गए “वोट हेरफेर” के आरोप और एक ही पते पर दर्ज असामान्य संख्या में मतदाताओं के आंकड़े इस ओर इशारा करते हैं कि सिस्टम में कहीं न कहीं गंभीर खामी है। संसद के भीतर शोर-शराबा तो हुआ, लेकिन ठोस जवाबों की कमी ने अविश्वास को और गहरा किया। यही वह मोड़ था जहाँ 2025 ने लोकतंत्र के भीतर मौजूद दरारों को उजागर कर दिया।

राष्ट्रीय राजनीति में सबसे चौंकाने वाली घटना उपराष्ट्रपति का अचानक इस्तीफ़ा रहा। सार्वजनिक जीवन में सक्रिय रहते हुए अचानक स्वास्थ्य कारणों का हवाला देकर पद छोड़ना कई सवाल छोड़ गया। बाद में नए उपराष्ट्रपति का चुनाव हो गया, लेकिन यह प्रकरण सत्ता के भीतर बढ़ते दबाव और असहजता का संकेत बन गया। साथ ही, सत्तारूढ़ दल के अंदर नेतृत्व और संगठनात्मक संतुलन को लेकर उभरी खामोश खींचतान भी चर्चा का विषय रही।

विदेश नीति और सुरक्षा के मोर्चे पर भी 2025 किसी पहेली से कम नहीं रहा। एक आतंकी हमले के बाद की गई सैन्य कार्रवाई, उसके दावों-प्रतिदावों और फिर अचानक घोषित युद्धविराम ने कई अनुत्तरित प्रश्न खड़े किए। अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता की भूमिका और सरकार की चुप्पी ने यह संदेह और गहरा किया कि पूरी सच्चाई जनता के सामने नहीं रखी गई।
दिल्ली की राजनीति में सत्ता परिवर्तन हुआ, लेकिन आम नागरिक की ज़िंदगी में राहत के संकेत कम ही दिखे। प्रदूषण, बेरोज़गारी और महंगाई जैसे मुद्दे जस के तस रहे। नीति आयोग की रिपोर्टें और विकास पर संवाद अपनी जगह, मगर ज़मीनी हक़ीक़त यह रही कि युवा रोज़गार के लिए भटकता रहा और आम आदमी कर व्यवस्था के बोझ से जूझता रहा।

कुल मिलाकर, 2025 ने यह साफ़ कर दिया कि भारतीय राजनीति अब सिर्फ़ जनकल्याण का दावा नहीं रही, बल्कि आंकड़ों की बाज़ीगरी, रहस्यमय फ़ैसलों और सत्ता की राजनीति का जटिल खेल बन चुकी है। जब तक संस्थाओं की स्वायत्तता मज़बूत नहीं होती और चुनावी प्रक्रियाओं पर उठे सवालों का विश्वसनीय समाधान नहीं निकलता, तब तक लोकतंत्र पर लगे ये दाग़ मिटेंगे नहीं। इतिहास गवाह है—जब सत्ता की चालें और जनता के हित आमने-सामने आते हैं, तो नुकसान हमेशा देश का ही होता है।






